Bihar

बिहार दिवस पर जानिए 22 मार्च का ऐतिहासिक महत्व और ‘पहले से अब’ तक बदलते बिहार की पूरी कहानी

पटना: हर साल 22 मार्च का दिन बिहार और बिहारियों के लिए बेहद खास होता है। यह दिन ‘बिहार दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो इस राज्य की अस्मिता, गौरवशाली इतिहास और इसके निरंतर आगे बढ़ने की कहानी को बयां करता है। इस साल बिहार अपना 114वां स्थापना दिवस मना रहा है।

लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर 22 मार्च को ही बिहार दिवस क्यों मनाया जाता है? और बीते कुछ दशकों में बिहार ने विकास के पैमाने पर कितना सफर तय किया है? आइए इस विशेष रिपोर्ट में इन सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

इतिहास के पन्नों से: 22 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है बिहार दिवस?

प्राचीन काल में मगध, वैशाली और मिथिला जैसे समृद्ध साम्राज्यों का केंद्र रहा बिहार, अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था। उस समय बंगाल एक बहुत बड़ा प्रांत था।

  • 1912 का ऐतिहासिक फैसला: प्रशासनिक सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए और बिहारियों की एक अलग पहचान की मांग के बाद, अंग्रेजों ने 22 मार्च 1912 को बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग कर ‘बिहार और उड़ीसा’ को एक नए और स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया।
  • उत्सव की शुरुआत: हालांकि यह राज्य 1912 में बना, लेकिन इसे एक बड़े उत्सव के रूप में मनाने की शुरुआत काफी बाद में हुई। साल 2010 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने 22 मार्च को ‘बिहार दिवस’ के रूप में मनाने का आधिकारिक फैसला किया, ताकि बिहार के लोगों में अपनी संस्कृति और विरासत के प्रति गर्व की भावना पैदा की जा सके।

कल का बिहार बनाम आज का बिहार: कितना हुआ परिवर्तन?

अगर हम 1990 और 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों के बिहार की तुलना आज के बिहार से करें, तो जमीनी स्तर पर व्यापक बदलाव देखने को मिलते हैं। विकास की इस यात्रा को हम कई अहम पैमानों पर समझ सकते हैं:

1. ढांचागत विकास (सड़क और पुल):

  • पहले: एक दौर था जब बिहार की सड़कों की हालत पूरे देश में चर्चा का विषय हुआ करती थी। गांवों तक पहुंचना मुश्किल था और राजधानी पटना से अन्य जिलों की दूरी तय करने में पूरा दिन लग जाता था।
  • अब: आज बिहार में सड़कों और पुलों का शानदार जाल बिछ चुका है। ‘हर गांव पक्की सड़क’ योजना ने ग्रामीण आवाजाही को सुगम बनाया है। गंगा और कोसी जैसी नदियों पर बने नए महासेतुओं ने उत्तर और दक्षिण बिहार की दूरियों को काफी कम कर दिया है।

2. बिजली के क्षेत्र में क्रांति:

  • पहले: 15-20 साल पहले बिहार में बिजली का मतलब शहरों में कुछ घंटों की आपूर्ति और गांवों में लालटेन युग था।
  • अब: आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। बिहार के लगभग हर गांव और हर घर तक बिजली पहुंच चुकी है। शहरों में 22-24 घंटे और गांवों में 18-20 घंटे बिजली रहना अब एक आम बात है।

3. महिला सशक्तिकरण और शिक्षा:

  • पहले: कन्या भ्रूण हत्या और लड़कियों के स्कूल ड्रॉपआउट का रेट काफी अधिक था। महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी न के बराबर थी।
  • अब: ‘साइकिल योजना’ और ‘पोशाक योजना’ ने स्कूली शिक्षा में लड़कियों की संख्या में क्रांति ला दी है। इसके अलावा, ‘जीविका’ परियोजना से जुड़कर लाखों ग्रामीण महिलाएं आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं। पंचायती राज में महिलाओं को 50% आरक्षण देकर बिहार ने राजनीतिक सशक्तिकरण की मिसाल पेश की है।

4. कानून व्यवस्था:

  • पहले: 90 के दशक में कानून व्यवस्था की लचर स्थिति, जिसे मीडिया में अक्सर ‘जंगलराज’ कहा गया, एक बड़ी समस्या थी। अपहरण और अपराध उद्योग बन गए थे।
  • अब: वर्तमान में कानून व्यवस्था की स्थिति में पहले के मुकाबले भारी सुधार हुआ है। हालांकि, छुटपुट अपराध अब भी चुनौती हैं, लेकिन संगठित अपराध पर काफी हद तक लगाम लगी है।

मंजिल अभी दूर है: वर्तमान की बड़ी चुनौतियां

यह सच है कि बिहार ने बुनियादी ढांचे में लंबी छलांग लगाई है, लेकिन एक ईमानदार आकलन यह भी बताता है कि कई मोर्चों पर अभी मीलों का सफर तय करना बाकी है:

  • औद्योगीकरण और रोजगार का अभाव: आज भी बिहार में बड़े उद्योगों और आईटी सेक्टर का घोर अभाव है। इस कारण युवाओं को रोजगार के लिए मजबूरन दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। ‘ब्रेन ड्रेन’ और मजदूरों का पलायन आज भी बिहार की सबसे बड़ी पीड़ा है।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता: स्कूलों और अस्पतालों की इमारतें तो बनी हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं के लिए बिहार के लोग आज भी दिल्ली या अन्य महानगरों पर निर्भर हैं।
  • बाढ़ और सुखाड़ की विभीषिका: हर साल उत्तर बिहार बाढ़ की चपेट में आता है, जबकि दक्षिण बिहार सूखे से जूझता है। इस प्राकृतिक आपदा का कोई स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।

कल के बिहार और आज के बिहार में जमीन-आसमान का अंतर है। लालटेन और गड्ढे वाली सड़कों से निकलकर राज्य ने एलईडी बल्ब्स और एक्सप्रेस-वे तक का सफर तय किया है। लेकिन जब तक रोजगार, उद्योग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक विकास की यह कहानी अधूरी है। बिहार दिवस सिर्फ जश्न का दिन नहीं, बल्कि इसी आत्म-मंथन का भी दिन है। आप सभी को बिहार दिवस कि हार्दिक शुभकामनाएं।

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