वैशाली नाव हादसा: टूटी नाव में स्टील की प्लेट चिपकाकर बैठाए गए थे 19 लोग, लापरवाही पर सीओ और थानाध्यक्ष पर गिरी गाज
वैशाली जिले के राघोपुर इलाके में हुए हृदयविदारक नाव हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। रात करीब साढ़े आठ बजे बगल के गांव में भोज खाने जा रहे बच्चों से भरी एक छोटी प्राइवेट नाव के पलटने से 15 साल से कम उम्र के 13 बच्चों की डूबकर दर्दनाक मौत हो गई, जबकि इस हादसे में बचाए गए 7 अन्य लोगों को इलाज के लिए एनएमसीएच अस्पताल भेजा गया है जहाँ उनकी हालत स्थिर बनी हुई है। घटना के बाद से ही पूरे इलाके में मातम पसरा हुआ है और एक ही परिवार के कई सदस्यों के चले जाने से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।

इस भीषण दुर्घटना के बाद मौके पर रात भर और अगले दिन कैंप कर रहीं वैशाली की जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जांच समिति की रिपोर्ट का खुलासा किया, जिसमें घोर लापरवाही की बात सामने आई है। डीएम ने बताया कि जिस निजी नाव से यह हादसा हुआ, उसका इस्तेमाल पिछले दो महीने से आपदा के कार्यों में किया जा रहा था और उसमें पहले से एक छेद था। लोगों को इस छेद की जानकारी थी, लेकिन उसे नीचे से एक स्टील की प्लेट लगाकर और ऊपर से रंग करके छुपा दिया गया था।
अमूमन पांच लोगों की क्षमता वाली इस छोटी सी नाव में घटना के वक्त ओवरलोडिंग करते हुए कुल 19 लोग सवार हो गए थे। लोगों के बैठने के दौरान दबाव पड़ने से नीचे लगी स्टील की प्लेट हट गई और नाव में तेजी से पानी भरने लगा। जांच में यह घातक बात भी सामने आई कि नाव को किसी चप्पू के बजाय हाथों से चलाकर आगे बढ़ाया जा रहा था।
अत्यधिक भीड़ और पानी भरने से नाव अपना संतुलन खोकर पलट गई और सीधे बच्चों के ऊपर आ गिरी, जिसके नीचे दब जाने से कई बच्चे समय रहते बाहर नहीं निकल सके। हालांकि, घटना के तुरंत बाद स्थानीय लोगों और गोताखोरों की मदद से बचाव कार्य शुरू कर रात साढ़े दस बजे से पहले सभी को बाहर निकाल लिया गया था।
स्थानीय लोगों द्वारा इसे पंचायत स्तर से मिली सरकारी नाव बताए जाने और चार महीने पहले तत्कालीन सीओ को मरम्मत के लिए आवेदन दिए जाने के दावे को डीएम वर्षा सिंह ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि 2016 के बाद इस बार राघोपुर में आई भीषण बाढ़ को देखते हुए ब्लॉक में केवल 6 बड़ी सरकारी नावें हैं और करीब 150 निजी नावों को परवाना जारी कर आपदा राहत के लिए अनुबंधित किया गया था।
सरकारी नावों के लिए लॉगबुक सहित कई प्रोटोकॉल होते हैं, इसलिए यह निश्चित तौर पर सरकारी नाव नहीं थी और न ही सीओ कार्यालय या जिला कार्यालय में इसकी मरम्मत से जुड़ा कोई लिखित आवेदन मिला है। डीएम ने बताया कि धारा 163बी के तहत सूर्यास्त के बाद किसी भी सरकारी या निजी नाव के परिचालन पर पूरी तरह रोक लगाई गई थी, जिसका सीधा उल्लंघन हुआ है।
जलस्तर बढ़ने पर ‘सोथा’ जैसे इलाकों में चौकीदार और कर्मचारियों के जरिए निगरानी तंत्र बनाने और अवैध परिचालन रोकने में विफल रहने के कारण स्थानीय अंचल अधिकारी (सीओ) और थाना अध्यक्ष (एसएचओ) पर कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन ने अब किसी भी जीर्ण-शीर्ण नाव के परिचालन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है और कहा है कि जहां आपदा में नाव क्षतिग्रस्त होने का प्रमाण मिलेगा, वहां आपदा राशि से मरम्मत में सहयोग किया जाएगा।
दूसरी ओर, इस दुखद हादसे के बाद पीड़ित परिवारों को राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है। प्रशासन के अनुसार, हादसे में जान गंवाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के आश्रित परिवार को आपदा अनुग्रह अनुदान के तहत चार-चार लाख रुपये की सहायता राशि उपलब्ध करा दी गई है।
इसके अतिरिक्त, कबीर अंत्येष्टि योजना के तहत प्रत्येक मृतक के परिवार को अंतिम संस्कार के लिए तीन-तीन हजार रुपये दिए गए हैं और सभी मृतकों के अभिभावकों को मुख्यमंत्री पारिवारिक लाभ योजना के तहत 20-20 हजार रुपये की राशि भी प्रदान की गई है। हादसे के बाद प्रधानमंत्री राहत कोष से भी आर्थिक सहायता की घोषणा की गई है, जिसके तहत प्रत्येक मृतक के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और अस्पताल में इलाजरत प्रत्येक घायल व्यक्ति को 50-50 हजार रुपये देने का ऐलान किया गया है।
हालांकि, घटना की रात मौके पर ग्रामीणों और पीड़ित परिजनों का गुस्सा प्रशासन के खिलाफ फूट पड़ा था। शवों के पास मौजूद शोकाकुल ग्रामीणों ने पुलिस अधिकारियों के सामने हंगामा करते हुए आरोप लगाया कि हादसा शाम 7 बजे ही हो गया था, लेकिन एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें साढ़े तीन से चार घंटे की देरी से रात 11 बजे तब मौके पर पहुंचीं, जब ग्रामीण खुद ही छानबीन और शवों को निकालने का काम कर चुके थे। एक-एक घर से पांच से सात लोगों की लाशें निकलने से आहत ग्रामीणों ने प्रशासन पर केवल दिखावा करने का आरोप लगाया और मांग की कि जब तक मुख्यमंत्री खुद मौके पर नहीं आएंगे, तब तक वे शवों को नहीं उठने देंगे।
इस भीषण त्रासदी की खबर मिलते ही राघोपुर विधायक तेजस्वी यादव भी दिल्ली में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ लोकतंत्र बचाने के लिए चल रहे आंदोलन को छोड़कर आनन-फानन में पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे। परिजनों से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त करने के बाद तेजस्वी यादव ने कहा कि एक ही परिवार के सात-आठ लोगों की मौत होना और कई माताओं की कोख सूनी हो जाना कोई मामूली हादसा नहीं है।
उन्होंने स्वास्थ्य और बचाव व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि न तो अस्पताल में और न ही एंबुलेंस में ऑक्सीजन की व्यवस्था थी, और मौके पर न दवा थी और न ही डॉक्टर मौजूद थे। उन्होंने कहा कि अगर समय रहते एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम पहुंच जाती और ऑक्सीजन व दवा मिल जाती, तो कई बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।
तेजस्वी यादव ने सरकार से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए और पीड़ित परिवारों को केवल चार लाख रुपये के मुआवजे से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें तीन डेसिमल जमीन भी दी जाए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे दुख की इस घड़ी में पीड़ित परिवारों के साथ खड़े हैं और उन्हें न्याय दिलाने के लिए विधानसभा में इस मुद्दे को पूरी मजबूती के साथ उठाएंगे।



