बिहार में मनरेगा का ‘कागजी खेल’: समस्तीपुर के घोटाले ने खोली पोल, सभी 38 जिलों में फोरेंसिक जांच की उठी मांग
पटना / मुंगेर: बिहार में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत हो रहे कार्यों में एक बड़े स्तर के ‘महाघोटाले’ की बू आ रही है। समस्तीपुर जिले के उजियारपुर प्रखंड अंतर्गत ‘लखनीपुर महेश पट्टी’ में उजागर हुए लाखों रुपये के मनरेगा घोटाले के बाद अब पूरे राज्य के सिस्टम पर सवाल खड़े हो गए हैं।

इस मामले में मुंगेर के आरटीआई कार्यकर्ता और वरिष्ठ नागरिक (दिव्यांगजन) श्याम मुरारी प्रसाद ने सीधा मोर्चा खोलते हुए बिहार के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखकर पिछले दो साल की सभी मनरेगा योजनाओं की राज्य-स्तरीय फोरेंसिक जांच की मांग की है।
दी गई आवेदन के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय के लोक शिकायत पोर्टल (पंजीकरण संख्या: PMOPG/E/2026/0163214) और बिहार सरकार को भेजे गए इस पत्र में आवेदक ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न बन चुका है।
लखनीपुर महेश पट्टी से सामने आया ‘पैटर्न’
पत्र में आरोप लगाया गया है कि लखनीपुर महेश पट्टी में लोक सेवकों द्वारा 3.21 लाख और 9.91 लाख रुपये के घोटाले ने यह साबित कर दिया है कि बिहार में कागजों पर फर्जी मजदूरी, गलत मास्टर रोल, बिना जमीन पर नापी किए ‘क्लीन चिट’ देना और पोर्टल फ्रीज होने के बाद ‘बैकडोर’ से भुगतान करना एक आम बात हो गई है।
गरीबों का हक बचाने के लिए मुख्यमंत्री से 5 प्रमुख मांगें:
आरटीआई कार्यकर्ता ने इस ‘लूट’ को रोकने के लिए सरकार से जनहित में निम्नलिखित सख्त कदम उठाने की अपील की है:
- 100% भौतिक सत्यापन और विशेष ऑडिट: वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और वर्तमान 2025-26 तक की हर मनरेगा योजना की 100% भौतिक नापी की जाए। ड्रोन/जियो-टैग तस्वीरों का मिलान और NREGA MIS डेटा का क्रॉस-वेरिफिकेशन हो।
- स्वतंत्र राज्य-स्तरीय निगरानी दल: जांच के लिए हर प्रमंडल में DRDA के बाहर के कार्यपालक अभियंता, विजिलेंस अधिकारी और IT फोरेंसिक एक्सपर्ट की टीम बने। इस जांच में स्थानीय अधिकारियों (BPO, PO, JE, AE) को बिल्कुल शामिल न किया जाए ताकि लीपापोती न हो सके।
- वैज्ञानिक साक्ष्य को मिले अहमियत: फर्जी हाजिरी वाले हर मामले में मजदूरों के CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड), बैंक/ATM ट्रांजेक्शन और आधार ऑथेंटिकेशन लॉग की अनिवार्य रूप से जांच हो।
- 60 दिन में FIR और रिकवरी: जांच रिपोर्ट 60 दिनों के भीतर सार्वजनिक की जाए। दोषी जनप्रतिनिधियों, कर्मियों और ठेकेदारों पर IPC की धारा 467, 468, 409 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज हो। साथ ही, भ्रष्ट अधिकारियों के वेतन और पेंशन से गबन की राशि वसूली जाए और उन्हें 5 साल के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाए।
- पारदर्शिता के लिए ‘सत्यापन डैशबोर्ड’: हर जिले का एक ‘मनरेगा सत्यापन डैशबोर्ड’ बने, जहां आम जनता किए गए काम की फोटो, मापी पुस्तिका (MB) और भुगतान का विवरण खुद देख सके।
70% से अधिक योजनाओं में मिलेगी धांधली
आवेदक श्याम मुरारी प्रसाद ने पत्र के अंत में दावा किया है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो 70% से अधिक मामलों में भारी अनियमितता उजागर होगी। उन्होंने सरकार को संवैधानिक दायित्व की याद दिलाते हुए इसे “गरीब मजदूरों के हक की लूट” करार दिया है।
अब देखना यह है कि लखनीपुर महेश पट्टी के फर्जीवाड़े से उठी यह चिंगारी क्या बिहार के पूरे मनरेगा सिस्टम में बदलाव ला पाएगी? क्या राज्य सरकार इस गंभीर शिकायत पर संज्ञान लेते हुए स्वतंत्र जांच का आदेश देगी, या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में कहीं गुम हो जाएगा। बहरहाल, इस पत्र ने मनरेगा की कार्यप्रणाली और सरकारी दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।



