कागजों पर मजदूर, फाइलों में विकास: बिहार में ‘मनरेगा’ कैसे बन गई भ्रष्टाचारियों की ‘धनरेगा’? ऐसे कि जाती है फर्जीवाड़े…
बिहार में ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन के उद्देश्य से शुरू की गई ‘मनरेगा’ (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) योजना अब भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का पर्याय बन चुकी है। सरकार की नाक के नीचे विकास के नाम पर एक ऐसा खेल चल रहा है, जहां योजनाएं जमीन पर नहीं, बल्कि सिर्फ फाइलों और कागजों में पूरी हो रही हैं।

जनता की गाढ़ी कमाई और टैक्स का पैसा अधिकारियों से लेकर गांव के जनप्रतिनिधियों की जेबों में कुछ इस तरह जा रहा है, जैसे यह पैसा विकास के लिए नहीं, बल्कि इनकी झोली भरने के लिए ही आवंटित किया गया हो। आइए समझते हैं कि इस ‘बंदरबांट’ और सिंडिकेट का यह पूरा नेक्सस आखिर कैसे काम कर रहा है:
फाइलों में विकास: जमीन पर नदारद हैं कार्य
स्थानीय जनप्रतिनिधि और बिहार पंचायत रोजगार सेवक मिलकर विकास कार्यों का एक ऐसा मायाजाल बुनते हैं, जो हकीकत में कहीं नजर नहीं आता। मनरेगा के तहत होने वाले तमाम कार्य सिर्फ रजिस्टरों पर अंकित किए जाते हैं। जब कोई जागरूक नागरिक या आम जनता इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों से करती है, तो कार्रवाई के नाम पर महज एक भद्दा मजाक किया जाता है।
अधिकारी रिश्वत लेकर सो जाते हैं और दिखावे के लिए एकाध छोटी योजनाओं को रद्द कर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम जनता आखिर करे तो करे क्या?
“कौन क्या कर लेगा?” – तय है हर कुर्सी का ‘कमीशन’
भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि स्थानीय जनप्रतिनिधि अब खुलेआम सीना तानकर कहते हैं, “हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा?” यह हौसला उन्हें उस भ्रष्ट सिस्टम से मिलता है जहां ऊपर से लेकर नीचे तक सबका हिस्सा पहले से तय है:
- प्रखण्ड कार्यक्रम पदाधिकारी (BPO): किसी भी कार्य के एस्टीमेट का 5% हिस्सा इन्हें एडवांस में ही मिल जाता है।
- जिला स्तरीय अधिकारी: बिल पास कराने और पैसे की तुरंत निकासी के लिए जिला स्तर के अधिकारियों को 10 से 20 हजार रुपये की रिश्वत दी जाती है।
जब बिना काम किए, सिर्फ रिश्वत के दम पर आसानी से पैसों की निकासी हो रही है, तो जनप्रतिनिधियों को असल काम करवाने की जरूरत ही महसूस नहीं होती।
जॉब कार्ड का गोरखधंधा: फर्जी मजदूरों का खेल
मनरेगा का मुख्य उद्देश्य गरीब मजदूरों को रोजगार देना है, लेकिन यहां मजदूर भी सिर्फ ‘रजिस्टर’ तक ही सीमित हैं। फर्जीवाड़े का यह तरीका बेहद हैरान करने वाला है:
- मजदूरों का फर्जी चयन: स्थानीय जनप्रतिनिधि ऐसे लोगों के जॉब कार्ड का चयन करते हैं जो पहले से ही किसी अन्य व्यवसाय या कार्य में लगे होते हैं और जिन्हें वास्तव में मजदूरी नहीं करनी होती।
- कमीशन की सेटिंग: इन ‘फर्जी मजदूरों’ से पहले ही यह शर्त तय कर ली जाती है कि उनके जॉब कार्ड का उपयोग सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए होगा।
- पैसों की हेराफेरी: सरकार द्वारा जॉब कार्ड से लिंक बैंक अकाउंट में 4 से 5 हजार रुपये भेजे जाते हैं। इसमें से खाताधारक (मजदूर) को बिना कुछ किए 500 से 1000 रुपये कमीशन के तौर पर दे दिए जाते हैं। बाकी के पैसे निकालकर वापस जनप्रतिनिधि अपनी जेब में डाल लेते हैं।
इस तरह 100-200 फर्जी मजदूरों के खातों में छोटी-छोटी राशियां भेजकर, एक बहुत बड़ी रकम को बेहद शातिर तरीके से निकाल लिया जाता है।
जांच के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’
चूंकि इस पूरी लूट में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी अधिकारियों और कर्मचारियों का हिस्सा तय होता है, इसलिए कोई भी अधिकारी इस फर्जीवाड़े की निष्पक्ष जांच नहीं करता। यदि कभी ऊपर से दबाव आता है या दिखावे की कार्रवाई करनी होती है, तो जानबूझकर उन योजनाओं को रद्द किया जाता है जिनका एस्टीमेट और बजट सबसे छोटा होता है। वहीं, जिन बड़ी योजनाओं में करोड़ों का बजट होता है, उनमें मोटा पैसा ऐंठकर उन्हें क्लीन चिट दे दी जाती है।
बिहार में मनरेगा के नाम पर चल रहा यह खेल सिर्फ एक योजना की विफलता नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर एक करारा तमाचा है। जब तक इस सिंडिकेट पर सरकार और सतर्कता विभाग (Vigilance) का कड़ा डंडा नहीं चलता और भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्तियों की जांच नहीं होती, तब तक जनता के टैक्स का पैसा यूं ही चंद लोगों की तिजोरियां भरता रहेगा। जरूरत है कि कागजी कार्रवाई से बाहर निकलकर कार्यों का ‘फिजिकल वेरिफिकेशन’ (भौतिक सत्यापन) किया जाए और दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।



