सुशासन के मुंह पर तमाचा! समस्तीपुर जिला परिषद कार्यालय बना ‘मयखाना’, सरकारी दफ्तर में दिन-दहाड़े छलकाए जा रहे जाम
समस्तीपुर: बिहार में ‘पूर्ण शराबबंदी’ का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार और उसके सिस्टम की असलियत एक बार फिर पूरी तरह से नंगी हो गई है। जिस सरकारी तंत्र के कंधों पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है, उसी तंत्र के नुमाइंदों ने सरकारी दफ्तर को ही ‘बार’ और ‘मयखाना’ बना डाला है। समस्तीपुर जिला परिषद कार्यालय का एक ऐसा शर्मनाक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे की नींद हराम कर दी है और ‘सुशासन’ के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं।

दफ्तर में काम नहीं, चल रही है ‘कॉकटेल पार्टी’
वायरल वीडियो चीख-चीख कर बता रहा है कि बिहार में शराबबंदी महज़ कागजों पर है। वीडियो में साफ दिख रहा है कि जिला परिषद कार्यालय के एक कमरे में चार लोग बड़े इत्मीनान से कुर्सियों पर जमे हैं और टेबल पर शराब की बोतलें और सजे हुए ग्लास उनकी ‘रंगीन मिजाजी’ की गवाही दे रहे हैं। चर्चा है कि इस बेशर्म महफिल में कार्यालय के ही कुछ कर्मचारी और एकाउंटेंट शामिल हैं। बताया जा रहा है कि इस ‘सरकारी मयखाने’ का वीडियो किसी अंदर के ही कर्मचारी ने गुप्त रूप से बनाकर वायरल कर दिया।
कानून का मखौल या सिस्टम का अहंकार?
यह सिर्फ एक वीडियो नहीं है, बल्कि उस खोखले सिस्टम का आईना है जो आम आदमी को तो शराब के शक में जेल की सलाखों के पीछे धकेल देता है, लेकिन सफेदपोश और सरकारी बाबू दफ्तरों के अंदर बैठकर बेखौफ जाम छलकाते हैं। जहां जिले के विकास की योजनाएं बननी चाहिए थीं, वहां पेग बनाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि इतनी भारी सुरक्षा और पाबंदियों के बीच सरकारी दफ्तर के अंदर शराब की बोतलें पहुंचीं कैसे? क्या प्रशासन अंधा हो चुका है या फिर यह सब उनकी नाक के नीचे मिलीभगत से चल रहा है?
बवाल मचने के बाद ‘डैमेज कंट्रोल’ और ‘जांच’ का रटा-रटाया राग
वीडियो के वायरल होने और फजीहत होने के बाद अब प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों ने ‘डैमेज कंट्रोल’ की कवायद शुरू कर दी है। उप विकास आयुक्त (डीडीसी) सूर्य प्रताप सिंह ने वही चिर-परिचित सरकारी रटा-रटाया जवाब देते हुए कहा है कि “मामला संज्ञान में आया है, सत्यता की जांच कराई जा रही है।” उन्होंने दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन तो दिया है, लेकिन जनता भली-भांति जानती है कि ऐसी जांच कमेटियों की फाइलें अक्सर ‘नशे’ में ही गुम हो जाती हैं।
वहीं, जिला परिषद अध्यक्ष खुशबू कुमारी ने भी मामले पर चिंता जताते हुए डीडीसी को पत्र लिखकर पल्ला झाड़ने और कार्रवाई की मांग करने की औपचारिकता पूरी कर ली है। उन्होंने दफ्तर की ‘गरिमा’ का हवाला दिया है, लेकिन सच तो यह है कि दफ्तर की गरिमा तो उसी वक्त तार-तार हो गई थी जब वहां पहली बोतल खुली होगी।
क्या बाबुओं पर गिरेगी गाज या फाइलों में दबेगा सच?
फिलहाल पूरे समस्तीपुर में इस ‘सरकारी मयखाने’ की ही चर्चा है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या प्रशासन सचमुच अपने इन ‘शराबी’ कर्मचारियों की गिरेबान तक पहुंच पाता है या फिर लीपापोती कर के इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? बिहार की जनता यह पूछ रही है कि क्या शराबबंदी का कानून सिर्फ गरीबों और कमजोरों के लिए है, या इन रसूखदार सरकारी बाबुओं पर भी कोई एक्शन होगा?
निगाहें अब जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, लेकिन सिस्टम की कार्यशैली को देखते हुए सवाल उठना लाजमी है— क्या सचमुच न्याय होगा, या ‘जाम’ के नशे में जांच भी झूमती नजर आएगी?



