बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था बेहाल: समस्तीपुर जिला अस्पताल में गार्ड कर रहे मरीजों का ‘इलाज’, 4 बजे ही बंद हो जाती है OPD!
समस्तीपुर: अगर आप बिहार के किसी सरकारी अस्पताल में इलाज कराने जा रहे हैं, तो सावधान हो जाइए! राज्य की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था का एक ऐसा सच सामने आया है, जो ‘सुशासन’ के दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। हालात ये हैं कि अब सरकारी अस्पतालों में आपकी बीमारी और इलाज डॉक्टर नहीं, बल्कि अस्पताल का गार्ड तय कर रहा है।

समस्तीपुर जिला अस्पताल, जो जिले का सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र है, इस समय कुव्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। जब जिले के सबसे बड़े अस्पताल की ये दुर्दशा है, तो ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
प्रमुख बिंदु (Highlights):
- नियमों की अनदेखी: शाम 6 बजे तक चलने वाली ओपीडी 4 बजे ही हो रही है बंद।
- गार्ड का राज: मरीजों को भगा रहे हैं गार्ड, खुद तय कर रहे हैं अस्पताल का समय।
- डॉक्टर नदारद: 5-10 मरीजों को देखकर डॉक्टर चले जाते हैं अपने प्राइवेट क्लीनिक।
- अधिकारियों की चुप्पी: सिविल सर्जन की नाक के नीचे चल रहा खेल, शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं।
कागजी नियमों की उड़ रही धज्जियां
अस्पताल के कागजों पर नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं। ओपीडी का समय (OPD Time):
पहली पाली: सुबह 9:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक
दूसरी पाली: शाम 4:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक
रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) का समय:
पहली पाली: सुबह 8:00 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक
दूसरी पाली: दोपहर 3:30 बजे से शाम 5:00 बजे तक
शाम 5 बजे तक मरीजों का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए और दूसरी पाली की ओपीडी (OPD) शाम 6 बजे तक चलनी चाहिए। लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है।
अस्पताल में शाम के 4 बजते ही स्टाफ पर्चा काउंटर बंद कर फरार हो जाता है। जो गरीब मरीज दूर-दराज के गांवों से अपना इलाज कराने पहुंचते हैं, उन्हें पर्चा कटाने के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।
मरीजों को बैरंग लौटा रहे अस्पताल के गार्ड
सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि मरीजों से डील करने का जिम्मा अब अस्पताल के गार्डों ने उठा लिया है। जब मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, तो गार्ड उन्हें यह कहकर बैरंग लौटा देते हैं कि दूसरी पाली की ओपीडी सिर्फ ढाई बजे से 4 बजे तक ही चलती है। बीमार और लाचार मरीजों की सुनने वाला कोई नहीं है, और उन्हें बिना इलाज के ही घर वापस लौटना पड़ता है।
निजी क्लीनिकों में जेबें भर रहे डॉक्टर
मरीजों की इस फजीहत के बीच डॉक्टरों का रवैया भी बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। आरोप है कि ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर महज 5-10 मरीजों का पर्चा देखकर अपनी ड्यूटी की खानापूर्ति कर लेते हैं। इसके तुरंत बाद वे अपने निजी क्लीनिकों (Private Clinics) का रुख करते हैं, जहां मरीजों से मोटी फीस वसूल कर अपनी जेबें भरी जा रही हैं।
अधिकारियों का रटा-रटाया जवाब- ‘शिकायत दर्ज कराइए’
यह पूरी धांधली और मनमानी समस्तीपुर सिविल सर्जन की नाक के नीचे खुलेआम चल रही है। अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी इस पूरे मामले से अनजान बने बैठे हैं।
जब मीडिया या आम लोग इस कुव्यवस्था पर अधिकारियों से सवाल पूछते हैं, तो उनका एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है- “आप शिकायत दर्ज करवा दीजिए।” लेकिन हकीकत यह है कि आज तक किसी भी शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
सम्राट चौधरी की सरकार में स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से चौपट नजर आ रही है। दावों और विज्ञापनों में भले ही सब कुछ ठीक बताया जा रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि आज भी गरीब और लाचार मरीज सरकारी अस्पतालों में सिर्फ और सिर्फ ‘भगवान भरोसे’ हैं।



