‘त्याग’ सिर्फ टैक्सपेयर ही क्यों करे, नेता क्यों नहीं? मुफ्त बिजली पर बहस तेज, सरकार को मिले 12 कड़े सुझाव
पटना: क्या देश का करदाता केवल सरकारी खजाना भरने और अपनी जेबें ढीली करने के लिए है? यह तीखा सवाल बिहार में एक नई बहस का केंद्र बन गया है। हाल ही में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा राज्य के टैक्सपेयर्स से 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की अपील की गई थी। इसके जवाब में अब जागरूक नागरिकों ने संविधान का हवाला देते हुए सरकार से पूछा है कि सरकारी खर्चों में कटौती का सारा बोझ सिर्फ आम आदमी पर क्यों? अगर खर्च घटाना ही है, तो शुरुआत नेताओं के ‘वीआईपी कल्चर’ से क्यों नहीं होनी चाहिए?

कहाँ से शुरू हुई यह बहस?
1 और 2 नवंबर 2026 को पटना में आयोजित ‘पाटलिपुत्र राष्ट्रीय युवा संसद-2.0’ में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आर्थिक रूप से सक्षम नागरिकों और आयकरदाताओं से अपील की थी कि वे स्वेच्छा से 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सब्सिडी छोड़ दें। हालांकि यह कोई बाध्यकारी आदेश नहीं बल्कि एक स्वैच्छिक अपील है, लेकिन इसने समानता और नागरिक अधिकारों की एक नई चर्चा छेड़ दी है।
संविधान का आईना: लाभ में समानता, तो त्याग में भेदभाव क्यों?
जागरूक नागरिकों ने इस अपील पर सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेदों का हवाला देते हुए कड़े सवाल दागे हैं:
- अनुच्छेद 265 (कर विधि के बिना नहीं): करदाता पहले से ही भारी टैक्स चुकाकर राष्ट्र-निर्माण में अपना योगदान दे रहे हैं। वे अपना फर्ज निभा चुके हैं।
- अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता): जब संविधान सबको समान मानता है, तो लोक कल्याण योजनाओं का लाभ भी समानता से मिलना चाहिए। ऐसे में ‘त्याग’ की अपील भी समानता के आधार पर सभी से होनी चाहिए, सिर्फ टैक्सपेयर्स से क्यों?
- अनुच्छेद 38 व 39: राज्य का काम लोक कल्याण को बढ़ावा देना और संसाधनों का समान वितरण करना है, न कि एक खास वर्ग (करदाताओं) पर संसाधनों को छोड़ने का नैतिक दबाव बनाना।
खर्च घटाना है, तो ऊपर से हो शुरुआत: सरकार को 12 जनहित सुझाव
टैक्सपेयर्स का स्पष्ट कहना है कि अगर सरकार वाकई में राजकोषीय घाटा कम करना चाहती है, तो इसके लिए एक विजनरी अप्रोच चाहिए। जनता ने सरकार के सामने 12 सूत्रीय कड़े सुझाव रखे हैं, जो सरकारी फिजूलखर्ची पर सीधा प्रहार करते हैं:
- वीआईपी कल्चर का अंत: राजनेताओं को मिलने वाले सरकारी वाहन एस्कॉर्ट और बड़े काफिलों की सुविधा तुरंत बंद होनी चाहिए।
- अधिकारियों के काफिले रुकें: Group-A स्तर के अधिकारियों के साथ चलने वाले अनावश्यक वाहनों के काफिले हटाए जाएं।
- वाहन पूलिंग लागू हो: Group-B अधिकारियों के लिए अलग-अलग गाड़ियों की जगह अनिवार्य रूप से ‘वाहन पूलिंग’ व्यवस्था लागू की जाए।
- सख्त मितव्ययिता: सभी सरकारी विभागों में खर्चों में कटौती के उपाय सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि सख्ती से जमीन पर लागू हों।
- भ्रष्ट कंपनियों पर जीरो टॉलरेंस: सरकारी ठेकों में भ्रष्टाचार करने वाली कंपनियों को बिना किसी रियायत के सीधे ब्लैकलिस्ट किया जाए।
- टेंडर प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता: टेंडर की शर्तें मानकीकृत हों और उनमें किसी भी बदलाव से पहले जनता से आपत्तियाँ व सुझाव मांगे जाएं।
- फाइव-स्टार संस्कृति पर रोक: सरकारी कार्यक्रमों के लिए फाइव-स्टार होटलों की बुकिंग बंद हो। कार्यक्रम सरकारी भवनों में हों या फिर वर्चुअल माध्यम से किए जाएं।
- हवाई यात्रा पर लगाम: नेताओं और अधिकारियों की फर्स्ट-क्लास हवाई यात्रा पर सख्त सीमा (Cap) तय हो, यह सिर्फ बेहद आपात स्थिति में ही मिले।
- विवेकाधीन निधि (Discretionary Fund) पर लिमिट: मंत्रियों और अधिकारियों के मनमाने खर्च वाली विवेकाधीन निधि पर एक सख्त सीमा तय की जाए।
- वेतन और भत्तों पर कैप: सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च पदों के वेतन और सुविधाओं पर एक उचित सीमा (Cap) लागू हो।
- ज़ीरो-बेस्ड बजटिंग अनिवार्य हो: हर साल बजट बनाते समय पुराने खर्चों को आंख मूंदकर आगे बढ़ाने के बजाय, हर खर्च को नए सिरे से उचित ठहराना अनिवार्य किया जाए।
- मनमाने बदलाव गैरकानूनी हों: टेंडर जारी होने के बाद उसमें होने वाले मनमाने और गुपचुप बदलावों को कानूनी रूप से अपराध घोषित किया जाए।
जनता का पैसा – जनता के विकास के लिए
नागरिकों द्वारा सोशल मीडिया और जन-मंचों पर जारी यह पोस्टर भले ही कोई सरकारी आदेश नहीं है, लेकिन यह एक गहरी नागरिक जागरूकता का प्रतीक है। इसका मूल मंत्र स्पष्ट है: पारदर्शिता, जवाबदेही और समानता। देश का करदाता सरकार का साझेदार है, कोई ‘एटीएम मशीन’ नहीं। जब तक सत्ता के गलियारों में सादगी नहीं आएगी, तब तक आम आदमी से त्याग की उम्मीद करना बेमानी है।




