कैमरे से डर या सुरक्षा का बहाना? RPF जबलपुर के नोटिस पर मचा बवाल, RTI कार्यकर्ता ने दी रेलवे को खुली चुनौती!
भारतीय रेलवे के स्टेशनों पर यात्रियों को परोसे जाने वाले खाने की गुणवत्ता अक्सर सवालों के घेरे में रहती है। लेकिन जब कोई नागरिक पत्रकार या यूट्यूबर इसका भंडाफोड़ करने कैमरे के साथ पहुँचता है, तो रेलवे प्रशासन सुधार करने के बजाय ‘नोटिस’ का डंडा चलाने लगता है। ताजा मामला जबलपुर रेलवे स्टेशन का है, जहाँ यूट्यूबर जसवंत सिंह राजपूत को RPF (रेलवे सुरक्षा बल) द्वारा भेजे गए एक नोटिस ने नया विवाद खड़ा कर दिया है।

इस नोटिस को लेकर बिहार के मुंगेर से वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन और आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता श्याम मुरारी प्रसाद ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इसे सीधे तौर पर ‘पारदर्शिता पर हमला’ और ‘कानून की आड़ में दमन’ करार दिया है।
बिना कानूनी धारा के ‘गोलमोल’ नोटिस: डराने की साजिश?
कानूनी विशेषज्ञों और RTI कार्यकर्ता के अनुसार, RPF जबलपुर द्वारा जारी किया गया नोटिस कानूनी रूप से बेहद कमजोर और संदेहास्पद है।भारत के कानूनी प्रावधानों के अनुसार, किसी भी आपराधिक या दंडात्मक नोटिस में यह स्पष्ट होना अनिवार्य है कि किस अधिनियम की किस सटीक धारा का उल्लंघन हुआ है।
लेकिन जसवंत सिंह को भेजे गए नोटिस में रेलवे अधिनियम 1989 की धारा 145 (उपद्रव/न्यूसेंस) या धारा 147 (अतिक्रमण) का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं है। इसमें सिर्फ “सुसंगत धाराओं” का गोलमोल जुमला लिखा गया है। RTI कार्यकर्ता का सीधा आरोप है कि – “धारा लिखने की हिम्मत नहीं, क्योंकि अपराध साबित नहीं कर सकते, इसलिए सिर्फ कार्रवाई की धमकी दी जा रही है।”
क्या रेलवे स्टेशन ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ है?
RPF ने अपने नोटिस में जबलपुर स्टेशन को ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ बताते हुए वीडियोग्राफी को अपराध बताया है। भारतीय रेलवे के नियमों के अनुसार, स्टेशनों पर ‘कमर्शियल वीडियोग्राफी’ (फिल्म या विज्ञापन की शूटिंग) के लिए अनुमति और फीस की आवश्यकता होती है। लेकिन आम यात्रियों और पत्रकारों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर जनहित (जैसे- वेंडर कार्ड चेक करना या खाने की गुणवत्ता दिखाना) के लिए की गई रिकॉर्डिंग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। इसे किसी राजपत्र या अधिसूचना द्वारा ‘प्रतिबंधित’ घोषित किए बिना, केवल ‘त्यौहार की भीड़’ का बहाना बनाकर नहीं रोका जा सकता। यह जनता की पत्रकारिता को कुचलने का प्रयास है।
संविधान vs RPF का ‘डिलीट’ फरमान
नोटिस में यूट्यूबर को पहले से पब्लिश किए गए वीडियो तुरंत डिलीट करने का आदेश दिया गया है। कानून के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (भाषण एवं अभिव्यक्ति की आजादी) के तहत नागरिकों को बोलने और दिखाने का अधिकार है। किसी RPF इंस्पेक्टर के पास बिना किसी सक्षम न्यायालय के आदेश के, किसी पत्रकार या नागरिक का वीडियो डिलीट करवाने का कानूनी अधिकार नहीं है। वीडियो हटवाने के लिए रेलवे को कोर्ट जाना होगा, न कि डराने वाले नोटिस भेजने होंगे।
नोटिस वापस लो, नहीं तो जवाब सड़क से लेकर अदालत तक मिलेगा
RTI कार्यकर्ता श्याम मुरारी प्रसाद ने रेल मंत्रालय और RPF को सीधी चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि सच्चाई दिखाने वाले कैमरे को डराने के लिए जसवंत सिंह पर गैरकानूनी दबाव बनाया गया, तो हर जिले से RPF की कार्यप्रणाली पर RTI की झड़ी लगा दी जाएगी। साथ ही इस अनियमितता के खिलाफ सोशल मीडिया, सड़क और अदालत तीनों जगह लड़ाई लड़ी जाएगी।
क्या रेल मंत्रालय देगा जवाब?
यह मामला सिर्फ एक यूट्यूबर का नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में ‘नागरिक पत्रकारिता’ बनाम ‘औपनिवेशिक पुलिसिंग’ का है। सवाल यह है कि क्या वेंडरों की मनमानी और खराब खाने का सच दिखाना रेलवे एक्ट में अपराध है? रेलवे बोर्ड को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या उनका फोकस यात्रियों की सुरक्षा और बेहतर खान-पान पर है, या फिर अपनी कमियां छुपाने के लिए कैमरे बंद करवाने पर? फिलहाल, RPF जबलपुर का यह नोटिस उन पर ही भारी पड़ता नजर आ रहा है, क्योंकि अब यह मामला स्थानीय स्तर से उठकर राष्ट्रीय स्तर पर अधिकारों की बहस बन चुका है।




