सरकारी राशन और मिड-डे मील का ‘मोटा चावल’: प्लास्टिक या पोषण का खजाना? जानिए फोर्टिफाइड राइस का पूरा सच
क्या आपने कभी गौर किया है कि आजकल सरकारी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और राशन की दुकानों से मिलने वाला चावल आम चावल से थोड़ा अलग और मोटा क्यों दिखता है? कई लोग अज्ञानतावश इसे ‘प्लास्टिक का चावल’ या ‘खराब क्वालिटी’ का चावल मान लेते हैं और खाने से कतराते हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है।

दरअसल, यह कोई साधारण चावल नहीं है, बल्कि भारत सरकार द्वारा कुपोषण से लड़ने के लिए तैयार किया गया ‘फोर्टिफाइड राइस’ (Fortified Rice) है। आइए जानते हैं क्या है यह फोर्टिफाइड चावल, यह कैसे बनता है और सरकार ने इसे क्यों लागू किया है।
फोर्टिफाइड चावल क्या है और यह कैसे बनता है?
फोर्टिफाइड चावल असल में पोषण से भरपूर एक विशेष चावल है, जिसे फैक्ट्रियों में एक खास वैज्ञानिक प्रक्रिया से तैयार किया जाता है।
- चावल को पीसना: सबसे पहले टूटे हुए सामान्य चावल को पीसकर उसका आटा बनाया जाता है।
- पोषक तत्व मिलाना: इस आटे में बच्चों और महिलाओं के शारीरिक व दिमागी विकास के लिए तीन सबसे जरूरी पोषक तत्व मिलाए जाते हैं— आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी-12।
- नया आकार देना: इसके बाद एक्सट्रूज़न तकनीक (Extrusion Technology) वाली मशीनों के जरिए इस आटे को वापस एकदम असली चावल के दानों का आकार दे दिया जाता है। इसे ‘फोर्टिफाइड राइस कर्नल’ (FRK) कहते हैं।
- मिश्रण: अंत में, इस खास पोषण वाले चावल (FRK) को सामान्य चावल के साथ (आमतौर पर 1:100 के अनुपात में) मिला दिया जाता है, जिसके बाद यह लोगों तक पहुंचने के लिए तैयार हो जाता है।
सरकार ने यह चावल क्यों लागू किया? (मुख्य उद्देश्य)
हमारे देश में लाखों बच्चे, महिलाएं और विशेषकर स्तनपान कराने वाली माताएं कुपोषण और एनीमिया (खून की कमी) का शिकार हैं। गरीब परिवारों को अपने रोजमर्रा के भोजन में पर्याप्त विटामिन्स और मिनरल्स नहीं मिल पाते हैं।
चूंकि भारत में चावल मुख्य भोजन (Staple Food) के रूप में खाया जाता है, इसलिए FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर सरकार ने चावल के जरिए ही देशवासियों तक जरूरी विटामिन पहुंचाने का यह मास्टरस्ट्रोक चला है।
योजना से जुड़े मुख्य सरकारी तथ्य और आंकड़े
पीआईबी (PIB) की रिपोर्ट और सरकारी घोषणाओं के अनुसार, इस योजना को युद्ध स्तर पर लागू किया जा रहा है। इसके कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- ऐतिहासिक घोषणा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 75वें स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 2021 को लाल किले की प्राचीर से देश के हर गरीब को कुपोषण से मुक्त करने के लिए फोर्टिफाइड चावल बांटने की घोषणा की थी।
- पूरा खर्च सरकार के कंधों पर: इस पूरी प्रक्रिया पर सालाना लगभग 2,700 करोड़ रुपये की लागत आती है। यह पूरी लागत भारत सरकार खुद खाद्य सब्सिडी के रूप में उठा रही है, ताकि आम जनता पर कोई आर्थिक बोझ न पड़े।
- बंपर खरीद: लोगों तक बिना किसी रुकावट के यह चावल पहुंचाने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य की एजेंसियों ने आपूर्ति के लिए 88.65 लाख मीट्रिक टन (LMT) फोर्टिफाइड चावल की खरीद की है।
- 2024 का लक्ष्य: सरकार ने मार्च 2024 तक इस योजना को चरणबद्ध तरीके से देश के हर हिस्से में पूरी तरह से लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
किन सरकारी योजनाओं के जरिए बंट रहा है यह चावल?
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की मंजूरी के बाद, अब यह ‘विटामिन वाला चावल’ देश की तीन प्रमुख योजनाओं के माध्यम से हर जरूरतमंद तक पहुंचाया जा रहा है:
- PM-POSHAN (पूर्व में मिड-डे मील): सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की थाली में।
- ICDS (समेकित बाल विकास सेवा): देशभर के आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं तक।
- TPDS (लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली): देश की लाखों राशन की दुकानों (PDS) के जरिए हर गरीब परिवार की रसोई तक।
फोर्टिफाइड चावल को ‘प्लास्टिक का चावल’ समझना पूरी तरह से एक भ्रम है। यह असल में देश को कुपोषण और खून की कमी से आज़ाद कराने की दिशा में एक बहुत बड़ा और वैज्ञानिक कदम है। अगर आपके घर में भी राशन या स्कूल से यह चावल आता है, तो सरकार के अनुसार इसे बिना किसी डर के पकाएं और खाएं। यह आपके और आपके बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है।



